Thursday, July 24, 2014

नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??

नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..? जानिए सच्चाई ...??
लेकिन... जानने से पहले..... हम एक झलक नालंदा विश्वविधालय के अतीत और उसके गौरवशाली इतिहास पर डाल लेते हैं....... फिर, बात को समझने में आसानी होगी....!
महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे।
यह... वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं।
अनेक पुराभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था.. तथा, प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र' का जन्म यहीं पर हुआ था।
इस महान विश्वविद्यालय की स्थापना व संरक्षण इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है..... और, इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग
मिला।
यहाँ तक कि... गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा... और, इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला... तथा , स्थानीय शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।
आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि... यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था.... और, विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10 ,000 एवं अध्यापकों की संख्या 2 ,000 थी....।
इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे.... और, नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे।
इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं सदी तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
उसी समय बख्तियार खिलजी नामक एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क मुस्लिम लूटेरा था ....!.
उसी मूर्ख मुस्लिम ने इसने 1199 इस्वी में इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
हुआ कुछ यूँ था कि..... उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
और..... एक बार वह बहुत बीमार पड़ा... जिसमे उसके मुस्लिम हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ... मगर वह ठीक नहीं हो सका...! और, मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया....!
तभी उसे किसी ने उसको सलाह दी... नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय....!
हालाँकि.... उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई हिन्दू और भारतीय वैद्य ... उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाया जाए.... फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए
उनको बुलाना पड़ा....!
लेकिन..... उस बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी कि.... मैं एक मुस्लिम हूँ ... इसीलिए, मैं तुम काफिरों की दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा... लेकिन, किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो....!
यह सुनकर.... बेचारे वैद्यराज को रातभर नींद नहीं आई...!
उन्होंने बहुत सा उपाय सोचा ..... और, सोचने के बाद...... वे वैद्यराज अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए...... और, उस बख्तियार खिलजी से कहा कि ...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
बख्तियार खिलजी ने.... वैसे ही कुरान को पढ़ा ....और ठीक हो गया ..... तथा, उसकी जान बच गयी.....!
इस से .... उस पागल को...... कोई ख़ुशी नहीं..... बल्कि बहुत झुंझलाहट हुई .... और, उसे बहुत गुस्सा आया कि..... उसके मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...??????
और..... उस एहसानफरामोश .... बख्तियार खिलजी ने ....... बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ... उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया ....... और. पुस्तकालयों को ही जला के राख कर दिया..... ताकि.... फिर कभी कोई ज्ञान ही ना प्राप्त कर सके.....!
कहा जाता है कि...... वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग लगने के बाद भी .... तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके जलती रहीं..!
सिर्फ इतना ही नहीं...... उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षुओं को भी मार डाले.
-------अब आप भी जान लें कि..... वो एहसानफरामोश मुस्लिम (हालाँकि, सभी मुस्लिम एहसानफरामोश ही होते हैं) ..... बख्तियार खिलजी ...... कुरान पढ़ के ठीक कैसे हो गया था.....
हुआ दरअसल ये था कि...... जहाँ...हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते... ना ही कभी, थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते हैं....!
जबकि.... मुस्लिम ठीक उलटा करते हैं..... और, वे कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के ही पलटते हैं...!
बस... वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था...
इस तरह..... वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज के दवा को चाट गया... और, ठीक हो गया ...!
परन्तु..... उसने इस एहसान का बदला ..... अपने मुस्लिम संस्कारों को प्रदर्शित करते हुए...... नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया...!
हद तो ये है कि...... आज भी हमारी बेशर्म और निर्ल्लज सरकारें...उस पागल और एहसानफरामोश बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन बनाये पड़ी हैं... !
शर्मिन्दिगी नाम की चीज ही नहीं बची है.... इन तुष्टिकरण में आकंठ डूबी हमारी तथाकथित सेकुलर सरकारों में ...!
जय महाकाल...!!!
नोट: लेख इतिहास पर आधारित है... फिर भी अगर किसी सज्जन या दुर्जन को लेख से शिकायत है तो.... पूरे प्रमाणों के साथ लेख पर चर्चा कर सकता है...!
कृपया ... फालतू में लेख को गालियाँ देकर.... अपने पारिवारिक संस्कारों का प्रदर्शन ना करें...!
यह प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विश्व विख्यात केन्द्र था...।

Monday, July 21, 2014

जानिए ‘ताजमहल’ नहीं, हिंदु के तेजोमहालयका ८५० वर्ष पुराना सच्चा इतिहास

जानिए ‘ताजमहल’ नहीं, हिंदु के तेजोमहालयका ८५० वर्ष पुराना सच्चा इतिहास

'ताजमहल' वास्तु मुसलमानोंकी नहीं, अपितु वह मूलतः हिंदुओंकी है । वहां इससे पूर्र्व भगवान शिवजीका मंदिर था, यह इतिहास सूर्यप्रकाशके जितना ही स्पष्ट है । मुसलमानोंने इस वास्तुको ताजमहल बनाया । ताजमहल इससे पूर्र्व शिवालय होनेका प्रमाण पुरातत्व विभागके अधिकारी, अन्य पुरातत्वतज्ञ, इतिहासके अभ्यासक तथा देशविदेशके तज्ञ बताते हैं । मुसलमान आक्रमणकारियोंकी दैनिकीमें (डायरी) भी उन्होंने कहा है कि ताजमहल हिंदुओंकी वास्तु है । तब भी मुसलमान इस वास्तुपर अपना अधिकार जताते हैं । शिवालयके विषयमें सरकारके पास सैकडों प्रमाण धूल खाते पडे हैं । सरकार इसपर कुछ नहीं करेगी । इसलिए अब अपनी हथियाई गई वास्तु वापस प्राप्त करने हेतु यथाशक्ति प्रयास करना ही हिंदुओंका धर्मकर्तव्य है । ऐसी वास्तुएं वापस प्राप्त करने हेतु एवं हिंदुओंकी वास्तुओंकी रक्षाके लिए ‘हिंदु राष्ट्र’ अनिवार्य है 

मुसलमान आक्रमणकारियोंने भारतके केवल गांव एवं नगरोंके ही नामोंमें परिवर्तन नहीं किया, अपितु वहांकी विशाल वास्तुओंको नियंत्रणमें लेकर एवं उसमें मनचाहा परिवर्तन कर निस्संकोच रूपसे  मुसलमानोंके नाम दिए । मूलतः मुसलमानोंको इतनी विशाल एवं सुंदर वास्तु बनानेका ज्ञान ही नहीं था । परंतु हिंदुओंने इस्लाम पंथकी स्थापनासे पूर्व ही अजिंटा तथा वेरूलके साथ अनेक विशाल मंदिरोंका निर्माणकार्य किया था । मुसलमान आक्रमणकारियोंको केवल भारतकी वास्तुकलाके सुंदर नमुने उद्ध्वस्त करना इतना ही ज्ञात था । गजनीद्वारा अनेक बार उद्ध्वस्त श्री सोमनाथ मंदिरसे लेकर तो आजकलमें अफगानिणस्तानमें उद्ध्वस्त बामयानकी विशाल बुद्धमूर्तितकका इतिहास मुसलमान आक्रमणकारियोंकी विध्वंसक मानसिकताके प्रमाण है ।

अंग्रेज सरकारद्वारा भी निश्चित रूपसे विध्वंस  !

मुसलमान आक्रमणकर्ताओेंके पश्चात आए अंग्रेज सरकारको भारतीय संस्कृतिके विषयमें तनिक भी प्रेम न रहनेके कारण उन्होंने मुसलमान आक्रमणकर्ताओंका ही अनुकरण किया ।

आक्रमणकर्ताओंकी दैनिकीमें ताजमहलके विषयमें सत्य !

आग्राकी ताजमहल वास्तुकी भी कहानी इसी प्रकारकी है । डॉ. राधेश्याम ब्रह्मचारीने ताजमहलका तथाकथित निर्माता शहाजहानके ही कार्यकालमें लिखे गए दस्तावेजोंका संदर्भ लेकर ताजमहलका इतिहास तपासकर देखा है । अकबरके समान शहाजहानने भी बादशहानामा ऐतिहासिक अभिलेखमें अपना चरित्र एवं कार्यकालका इतिहास लिखकर रखा था । अब्दुल हमीद लाहोरीने अरेबिक भाषामें बादशहानामा लिखा था, जो एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल ग्रंथालयमें आज भीr उपलब्ध है । इस बादशहानामाके पृष्ठ क्रमांक ४०२ एवं ४०३ के भागमें ताजमहल वास्तुका इतिहास छिपा हुआ है । इस भागका स्वच्छंद भाषांतर आगे दिया है ।
'शुक्रवार दिनांक १५ माह जमदिउलवलको शहाजहानकी पत्नी मुमताजुल जामानिका पार्थिव बुरहानपुरसे आग्रामें (उस समयका अकबराबाद) लाया गया । यहांके राजा मानसिंहके महलके रूपमें पहचाने जानेवाले अट्टालिकामें गाडा गया । यह अट्टालिका राजा मानसिंहके नाती राजा जयसिंहके मालिकीकी थी । उन्होंने यह अट्टालिका शहाजहानको देना स्वीकार किया । इसके स्थानपर राजा जयसिंहको शरीफाबादकी जहागिरी दी गई । यहां गाडे गए महारानीका विश्वको दर्शन न होने हेतु इस भवनका रूपांतर दर्गामें किया गया ।

मुमताजुुलकी मृत्यु !

शहाजहानकी पत्नीका मूल नाम था अर्जुमंद बानू । वह १८ वर्षोंतक शहाजहानकी रानी थी । इस कालावधिमें उसे १४ अपत्य हुए । बरहानपुरमें अंतिम जजगीमें उसकी मृत्यु हो गई । उसका शव वहींपर अस्थायी रूपसे गाडा गया ।

ताजमहल शिवालय होनेका सरकारी प्रमाण !

ताजमहलसे ४ कि.मी. दूरीपर आग्रा नगरमें बटेश्वर नामक बस्ती थी । वर्ष १९०० में पुरातन सर्वेक्षण विभागके संचालक जनरल कनिंघमद्वारा किए गए उत्खननमें वहां संस्कृतमें ३४ श्लोकमें मुंज बटेश्वर आदेश नामक पोथा पाया गया, जो लक्ष्मणपुरीके संग्रहालयमें संरक्षित है । इसमें श्लोक क्रमांक २५, २६ एवं ३६ महत्त्वपूर्ण हैं । इनका स्वच्छंद भाषांतर आगे दिया है ।
'राजाने एक संगमरवरी मंदिरका निर्माणकार्य किया । यह भगवान विष्णुका है । राजाने दूसरा शिवका संगमरवरी मंदिरका निर्माण कार्य किया । ' यह अभिलेख विक्रम संवत १२१२ माह आश्विन शुद्ध पंचमी, शुक्रवारको लिखा गया । (वर्तमान समयमें विक्रम संवत २०७० चालू है । अर्थात शिवालयका निर्माणकार्य कर लगभग ८५० वर्षोंकी कालावधि बीत गई है ।) (यह कालावधि लेख लिखनेके समयका अर्थात वर्ष १९०० के संदर्भके अनुसार है – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात )

शिवालयके प्रमाणको पुरातत्व शास्त्रज्ञोंका समर्थन !

१. प्रख्यात पुरातत्वशास्त्रज्ञ डी.जे. कालेने भी उपरोक्त दस्तावेजको समर्थन दिया है । उनके संशोधनके अनुसार राजा परमार्दीदेवने २ विशाल संगमरवरी मंदिरोंका निर्माणकार्य किया, जिसमें एक श्रीविष्णुका तो दूसरा भगवान शिवजीका था । कुछ समय पश्चात मुसलमान आक्रमणकर्ताओंने इन मंदिरोंका पावित्र्य भंग किया । इस घटनासे भयभीत होकर एक व्यक्तिने दस्तावेजको भूमिमें गाडकर रखा होगा । मंदिरोंकी पवित्रताका भंग होनेके कारण उनका धार्मिक उपयोग बंद हो गया । इसीलिए बादशहानामाके लेखक अब्दुल हमीद लाहोरीने मंदिरके स्थानपर महल ऐसा उल्लेख किया होगा ।
२. प्रसिद्ध इतिहासकार आर.सी. मुजुमदारके अनुसार चंद्रात्रेय (चंदेल) राजा परमार्दिदेवका दूसरा नाम था परमल एवं उसके राज्यका नाम था बुंदेलखंड । आज आग्रामें दो संगमरवरी प्रासाद हैं, जिसमें एक नूरजहांके पिताकी समाधि (श्रीविष्णु मंदिर) है एवं दूसरा (शिवमंदिर) ताजमहल है ।

ताजमहल हिंदुओंका शिवालय होनेके और भी स्पष्ट प्रमाण !

प्रसिद्ध इतिहासकार आर.सी. मुजुमदारके मतका समर्थन करनेवाले प्रमाण आगे दिए हैं ।
१. ताजमहलके प्रमुख गुंबजके कलशपर त्रिशूल है, जो शिवशस्त्रके रूपमें प्रचलित है ।
२. मुख्य गुंबजके उपरके छतपर एक संकल लटक रही है । वर्तमानमें इस संकलका कोई उपयोग नहीं होता; परंतु मुसलमानोंके आक्रमणसे पूर्व इस संकलको एक पात्र लगाया जाता था, जिसके माध्यमसे शिवलिंगपर अभिषेक होता था ।
३. अंदर ही २ मंजिलका ताजमहल है । वास्तव समाधि एवं रिक्त समाधि नीचेकी मंजिलपर है, जबकि २ रिक्त कबरें प्रथम मंजिलपर हैं । २ मंजिलवाले शिवालय उज्जैन एवं अन्य स्थानपर भी पाए जाते हैं ।
४. मुसलमानोंकी किसी भी वास्तुमें परिक्रमा मार्ग नहीं रहता; परंतु ताजमहलमें परिक्रमा मार्ग उपलब्ध है ।
५. फ्रांस देशीय प्रवासी तावेर्नियारने लिखकर रखा है कि इस मंदिरके परिसरमें बाजार भरता था । ऐसी प्रथा केवल हिंदु मंदिरोंमें ही पाई जाती है । मुसलमानोंके प्रार्थनास्थलोंमें ऐसे बाजार नहीं भरते ।

ताजमहल शिवालय होनेकी बात आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगद्वारा भी सिद्ध

वर्ष १९७३ में न्यूयार्कके प्रैट संस्थाके प्राध्यापक मर्विन मिल्सद्वारा ताजमहलके दक्षिणमें स्थित लकडीके दरवाजेका एक टुकडा अमेरिकामें ले जाया गया । उसे ब्रुकलिन महाविद्यालयके संचालक डॉ. विलियम्सको देकर उस टुकडेकी आयु कार्बन-१४ प्रयोग पद्धतिसे सिद्ध करनेको कहा गया । उस समय वह लकडा ६१० वर्ष (अल्प-अधिक ३९ वर्ष) आयुका निष्पन्न हुआ । इस प्रकारसे ताजमहल वास्तु शहाजहानसे पूर्व कितने वर्षोंसे अस्तित्वमें थी यह  सिद्ध होता है ।

शिवालय (अर्थात तेजोमहालय) ८४८ वर्ष पुराना !

यहांके मंदिरमें स्थित शिवलिंगको 'तेजोलिंग' एवं मंदिरको तेजोमहालय कहा जाता था । यह भगवान शिवका मंदिर अग्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध था । इससे ही इस नगरको आग्रा नाम पडा । मुंज बटेश्वर आदेशके अनुसार यह मंदिर ८४८ वर्ष पुराना है । इसका ३५० वां स्मृतिदिन मनाना अत्यंत हास्यजनक है ।


 

अफगानिस्तान में मिला ५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान

अफगानिस्तान में मिला ५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान अभी तक हम धर्मग्रंथों में ही पढ़ते ही रहे हैं कि रामायणकाल और महाभारत काल में विमान होते थे। पुष्पक विमान के बारे में भी हम सबने पढ़ा है।...लेकिन हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक ५००० साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतकालीन हो सकता है।

वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक 'टाइम वेल' में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि 'टाइम वेल' इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने २१ दिसंबर २०१० को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में..
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप ४० सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है।................................................................................................................................................................................
 More Details ....
""महाभारत कालीन युद्धक विमान""
5000 साल पहले का "विमान" मिला है ओसामा बिन लादेन नामक इस्लामी आतंकवादी को खोजते हुए अमेरिका के सैनिकों को अफगानिस्तान (कंधार) की एक गुफा में 5000 साल पहले का "विमान" मिला है ,जिसे महाभारत काल का बताया जा गया है !
सिर्फ इतना ही नहीं वरन् Russian Foreign Intelligence ने साफ़ साफ़ बताया है कि ये वही विमान है जो संस्कृत रचित महाभारत में वर्णित है |जब इसका इंजन शुरू होता है तो बड़ी मात्रा में प्रकाश का उत्सर्जन होता है। हालाँकि इस न्यूज़ को भारत के बिकाऊ मिडिया ने महत्व नहीं दिया क्यों कि, उनकी नजर में भारत के हम हिंदूओ ( आर्यो ) की महिमा बढ़ाने वाली ये खबर
सांप्रदायिक है !!
ज्ञातव्य है कि Russian Foreign Intelligence Service (SVR) report द्वारा 21 December 2010 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी जिसमे बताया गया था कि ये विमान द्वारा उत्पन्न एक
रहस्यमयी Time Well क्षेत्र है - जिसकी खतरनाक electromagnetic shockwave से ये अमेरिका के कमांडो मारे गये या गायब हो गये तथा इस की वजह से कोई गुफा में नहीं जा पा रहा।
शायद आप लोगों को याद होगा कि महाराज धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी एवं मामा शकुनि गंधार के ही थे | महाभारत में इस विमान का वर्णन करते हुए कहा गया है कि...

हम एक विमान जिसमे कि चार मजबूत पहिये लगे हुए हैं, एवं परिधि में बारह हाथ के हैं | इसके अलावा 'प्रज्वलन पक्षेपात्रों ' से सुसज्जित है | परिपत्र 'परावर्तक' के माध्यम से संचालित होता है और उसके अन्य घातक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं ! जब उसे किसी भी लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर पक्षेपित किया जाता है तो, तुरंत वह अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देता है यह जाते समय एक 'प्रकाश पुंज' का उत्पादन करता हैं !
( स्पष्ट बात है कि यहां महाभारत काल में विमान एवं मिसाइल की बात की जा रही है )
हमारे महाभारत के इसी बात को US Military के scientists सत्यापित करते हुए यह बताते हैं कि ये विमान 5000 हज़ार पुराना (महाभारत कालीन) है, और जब कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तो ये सक्रिय हो गया जिससे इसके चारों और Time Well क्षेत्र उत्पन्न हो गया और यही क्षेत्र विमान को पकडे हुए है इसीलिए इस Time Well क्षेत्र के सक्रिय होने के बाद 8 सील कमांडो गायब हो गए। जानकारी के लिए बता दूँ की Time Well क्षेत्र " विद्युत-चुम्बकीय " क्षेत्र होता है जो हमारे आकाश गंगा की तरह सर्पिलाकार होता है ।
वहीं एक कदम आगे बढ़ कर Russian Foreign Intelligence ने तो साफ़ साफ़ बताया कि ये वही विमान है जो संस्कृत रचित महाभारत में वर्णित है।
सिर्फ इतना ही नहीं SVR report का कहना है कि यह क्षेत्र 5 August को फिर सक्रिय हुआ था जिससे एक बार फिर electromagnetic shockwave नामक खतरनाक किरणें उत्पन्न हुई और ये इतनी खतरनाक थी कि इससे 40 सिपाही तथा trained German Shepherd dogs भी इसकी चपेट में आ गए।
ये प्रत्यक्ष प्रमाण है हमारे हिन्दू(आर्य) सनातन धर्म के उत्कृष्ट विज्ञान का और यह साफ साफ तमाचा है उन सेकुलरों( मुस्लिमों / ईसाईयों के हिमायतीयो ) के मुंह पर जो हमारे हिन्दू सनातन धर्म पर उंगली उठाते हैं और जिन्हें रामायण और महाभारत एक काल्पनिक कथा मात्र लगती है..!

ॐ शब्द की खोज नासा द्वारा

ॐ शब्द की खोज नासा द्वारा
 हिन्दू धर्म विश्व का एक मात्र सच्चा धर्म है
नासा ने वोएजर के नाम से अपना एक मिशन अंतरिक्ष में रवाना किया था जिसका एक उद्देश्य उसके
पूरे सफ़र के दौरान सुनाई देनेवाली ब्रह्मांडीय आवाजों को रिकॉर्ड करके उनका विश्लेषण
करना भी था. वोयेज़र यान से प्राप्त हुई साउंड रिकॉर्डिंग्स को तीन वर्षों तक अध्ययन करने के बाद नासा ने ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहस्यमयी आवाजों का विश्लेषण प्रस्तुत किया. हम लोग केवल 20 to 20,000
हर्ट्ज़ की ध्वनि को ही सुनने की क्षमता रखते है. इस फ्रीक्वेंसी से कही ऊपर की ब्राह्मांड में
व्याप्त ध्वनि को डिकोड करने पर नासा को जो ध्वनि सुनाई दी, वो थी ..... ॐ नासा द्वारा इसे The Sound of Sun
 

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अर्थात सूर्य की आवाज़ का नाम दिया गया है, और अब वो इस बात का रहस्य जानने को व्याकुल हैं कि आखिर हिन्दू धर्म में
ॐ के शब्द का प्रादुर्भाव कहाँ से हुआ.. ?? वो भी ईसा के जन्म से भी हज़ारों वर्ष पहले !
ॐ भारतीय संस्कृति औरभारतीय ज्ञान को जानो वरना भविष्य में आपकी आने वाली पीढ़ी को स्कूलो मे ये पढ़ाया जायेगा संस्कृत कि उत्पति यूरोप में हुई भगवत गीता का उपदेश भगवान कृष्ण ने यूरोप में दिया वेदो का ज्ञान यूरोप के पास था और नई पीढ़ी ये मान भी लेगी . कृपया इसे शेयर जरुर करे मित्रों ,, क्युकी हिन्दुओ को अभी अपने धर्म की ताकत
का कोई अंदाजा ही नही है । सभी हिन्दूओ को अपने सनातन धर्म की ताकत का एहसास दिलाना होगा । कुछ
नही पता लोगो को सनातन धर्म के बारे में इसलिए seculars की तादात बढ़ी हुई है

●जैसलमेर का कुलधरा● एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर जो भारत के आत्मसम्मान का प्रतीक भी है:

राजस्थान के जैसलमेर शहर से 18 किमी दूर स्थित कुलधरा गांव आज से 500 साल पहले 600 घरों और 85 गावों का पालीवाल ब्राह्मणों का साम्राज्य ऐसा राज्य था जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती हे...
रेगिस्तान के बंजर धोरो में पानी नहीं मिलता वहां पालीवाल ब्राह्मणों ने ऐसा चमत्कार किया जो इंसानी दिमाग से बहुत परे है .
पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्‍हणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। कुलधरा गाँव पूर्ण रूप से वैज्ञानिक तौर पर बना था। ईट पत्थर से बने इस गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था।
कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्‍तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । इस जगह गर्मियों में तापमान 45 डिग्री रहता हैं पर आप यदि अब भी भरी गर्मी में इन वीरान पडे मकानो में जायेंगे तो आपको शीतलता का अनुभव होगा।
गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी। घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं ।
उन्होंने जमीन में उपलब्ध पानी का प्रयोग नहीं किया, ना ही बारिश के पानी को संग्रहित किया बल्कि रेगिस्तान के मिटटी में मौजूद पानी के कण को खोजा और अपना गाव जिप्सम की सतह के ऊपर बनाया, उन्होंने उस समय जिप्सम की जमीन खोजी ताकि बारिश का पानी जमीन सोखे नहीं.
और आवाज के लिए गांव ऐसा बसाया कि दूर से अगर दुश्मन आये तो उसकी आवाज उससे 4 गुना पहले गांव के भीतर आ जाती थी. हर घर के बीच में आवाज का ऐसा मेल था जैसे आज के समय में टेलीफोन होते हैं.
जैसलमेर के दीवान ये बात हजम नहीं हुई की ब्राह्मण इतने आधुनिक तरीके से खेती करके अपना जीवन यापन कर रहे हैं तो उन्होंने खेती पर कर लगा दिया पर पालीवाल ब्राह्मणों ने कर देने से मना कर दिया.
उसके बाद दीवान सलीम सिंह को गाँव के मुखिया की बेटी पसंद आ गयी तो उसने कह दिया या तो बेटी दीवान को दे दो या सजा भुगतने के लिए तैयार रहो.
ब्राह्मणों को अपने आत्मसम्मान से समझौता बिलकुल बर्दाश्त नहीं था इसलिए रातोरात 85 गावों की एक महापंचायत बैठी और निर्णय हुआ की रातोरात कुलधरा खाली करके वो चले जायेंगे.
रातोरात 85 गाँव के ब्राह्मण कहाँ गए कैसे गए और कब गए इस चीज का पता आजतक कोई पता नहीं लगा है. पर जाते जाते पालीवाल ब्राह्मण शाप दे गए की ये कुलधरा हमेशा वीरान रहेगा इस जमीन पर कोई फिर से आके नहीं बस पायेगा.
आज भी जैसलमेर में जो तापमान रहता है गर्मी हो या सर्दी, कुलधरा गाव में आते ही तापमान में 4 डिग्री की बढ़ोतरी हो जाती है. वैज्ञानिकों की टीम जब पहुची तो उनकी मशीनो में आवाज और तरंगों की रिकॉर्डिंग हुई जिससे ये पता चलता हे की कुलधरा में आज भी कुछ शक्तियाँ मौजूद हैं जो इस गांव में किसी को रहने नहीं देती. मशीनो में रिकॉर्ड तरंगे ये बताती हैं की वहां मौजूद शक्तियां कुछ संकेत देती हैं.
आज भी कुलधरा गांव की सीमा में आते हैं मोबाइल नेटवर्क और रेडियो काम करना बंद कर देते हैं पर जैसे ही गावं की सीमा से बाहर आते हे मोबाइल और रेडियो शुरू हो जाते हैं |
आज भी कुलधरा शाम होते ही खाली हो जाता है और कोई इन्सान वहां जाने की हिम्मत नहीं करता. जैसलमेर जब भी जाना हो तो कुलधरा जरुर जाएं |

Sunday, July 20, 2014

अण्डे का सच और रहस्य........

अण्डे का सच और रहस्य जिसे पढ़ कर सारा भारत देश अंडा खाना छोड देगा
!आजकल मुझे यह देख कर अत्यंत खेद और आश्चर्य होता है की अंडा शाकाहार का पर्याय बन चुका है ,ब्राह्मणों से लेकर जैनियों तक सभी ने खुल्लमखुल्ला अंडा खाना शुरू कर दिया है...खैर मै ज्यादा भूमिका और प्रकथन में न जातीं हुई सीधे तथ्य पर आ रही हूँमादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में ...शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन हैइसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहुगी ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है ..इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उसपर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा ,अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर१) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है ,२) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermia, azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि ...वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है .६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक ,और अपवित्र और चंडाल कर्म हैइसकी जगह पर आप दूध पीजिए जो के पोषक , पवित्र और शास्त्र सम्मत भी है

Monday, December 23, 2013

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ .......

                     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (अंग्रेज़ी: Rashtriya Swayamsevak Sangh या R.S.S.) एक हिंदू राष्ट्रवादी संघटन है जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर.एस.एस. के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत सन् १९२५ में विजयदशमी के दिन डा. केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी । बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है। संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से ज्यादा शाखा हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग, वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है। संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है: केंद्र क्षेत्र प्रान्त विभाग जिला तालुका नगर मण्डल शाखा शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं: प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है। सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है। रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है। मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "मिलन" कहते है। संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है। पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,००० शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से चलता है। शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है। जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता है। ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं: दीपावली वर्ग - ये वर्ग तीन दिनों का होता है. ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है। शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है। निवासी वर्ग - ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है. ये वर्ग हर महीने होता है. ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है। संघ शिक्षा वर्ग - प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। "प्राथमिक वर्ग" एक सप्ताह का होता है, "प्रथम" और "द्वितीय वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं, जबकि "तृतीय वर्ग" 25 दिनों का होता है। "प्राथमिक वर्ग" का आयोजन सामान्यतः जिला करता है, "प्रथम संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है, "द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है। परन्तु "तृतीय संघ शिक्षा वर्ग" हर साल नागपुर में ही होता है। बौद्धिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है। शारीरिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है। हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है। महात्मा गाँधी की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति से क्षुब्ध होकर १९४८ में नाथूराम गोडसे ने उनका वध कर दिया था जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया। संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये। वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं। और २०१४ में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने वाले हैl वेब लिंक है .......  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ